चीनी का बड़ा संकट: कैसे भारत में चीनी की कमी होने लगी

दुनिया में चीनी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाला और दूसरा सबसे बड़ा उत्पादन करने वाला देश भारत, अब एक दशक में पहली बार बाहर से चीनी मंगाने की तैयारी कर रहा है। 20 अगस्त 2026 को विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने 10 लाख टन कच्ची चीनी बिना किसी टैक्स के मंगाने की अनुमति दी है। यह नियम 31 अक्टूबर तक लागू रहेगा, जबकि आमतौर पर चीनी पर 100 प्रतिशत आयात शुल्क देना पड़ता है। भारत ने आखिरी बार 2017-18 में घरेलू जरूरतों के लिए चीनी बाहर से मंगवाई थी।

sugar glut to shortage & high prices ahead of festivals

यह फैसला मई महीने से चली आ रही नीतियों के बदलाव का नतीजा है। सरकार ने पहले चीनी के निर्यात पर रोक लगाई, फिर अगस्त में डीलरों और थोक खरीदारों के लिए स्टॉक की सीमा तय की, और अब आयात की मंजूरी दे दी है। इन सभी कदमों के पीछे एक ही बड़ी वजह है—इस बार चीनी का उत्पादन देश की खपत से कम रह गया और ऊपर से त्योहारों का सीजन भी आ गया, जिससे चीनी की मांग बहुत बढ़ गई।

इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने पहले अंदाजा लगाया था कि चीनी का उत्पादन 3.1 करोड़ टन होगा, लेकिन असलियत में यह घटकर केवल 2.72 करोड़ टन ही रह पाया। हालांकि, चीनी उद्योग का कहना है कि बाजार में कोई भारी कमी नहीं है, बस उत्पादन का अनुमान लगाने में गलती हो गई थी।

भारत का इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम, जो 2003 में सिर्फ 5% के लक्ष्य के साथ शुरू हुआ था, 2026 तक E20 के लक्ष्य को पार कर चुका है। अब E85 और E100 फ्लेक्स-फ्यूल का काम भी शुरू हो गया है। सीज़न 2025-26 में लगभग 31 लाख टन चीनी के बराबर गन्ना इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया। गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में करने से चीनी मिलों को फायदा तो होता है और सरकार की स्वच्छ ईंधन नीति भी आगे बढ़ती है, लेकिन इससे बाजार में चीनी की मात्रा कम हो जाती है।

इस साल मानसून बहुत कमजोर रहा है, जो पिछले दस सालों में सबसे कम देखा गया। जून के महीने में कई जगहों पर बारिश सामान्य से 40 प्रतिशत तक कम हुई, जिसका सीधा असर गन्ने की फसल पर पड़ा।

सरकार गन्ना किसानों के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) तय करती है। 2025-26 के सीजन के लिए यह ₹355 प्रति क्विंटल था, जिसे अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले नए सीजन के लिए बढ़ाकर ₹365 कर दिया गया है। सरकार का मानना है कि चीनी उद्योग से करीब 5 करोड़ गन्ना किसान और उनके परिवार जुड़े हुए हैं, और यह उद्योग सीधे तौर पर करीब 5 लाख मजदूरों को काम देता है।

इंटरनेशनल शुगर ऑर्गनाइजेशन का कहना है कि 2026-27 में पूरी दुनिया में चीनी का उत्पादन 1.15% घटकर 18 करोड़ टन रह सकता है। इससे दुनिया भर में 2.62 लाख टन चीनी की कमी हो सकती है। ब्राज़ील में भी कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से चीनी मिलें चीनी के बजाय इथेनॉल बनाने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, जिससे पूरी दुनिया में चीनी की सप्लाई पर असर पड़ रहा है।

USDA का अनुमान है कि भारत 2026-27 में 36 लाख टन चीनी दूसरे देशों जैसे सूडान, लीबिया और सोमालिया को भेजेगा, और साथ ही करीब 24 लाख टन चीनी बाहर से मंगाएगा भी। जानकारों का कहना है कि भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए एक नियम होना चाहिए कि निर्यात की मंजूरी तभी दी जाए जब देश में खपत, इथेनॉल के लिए इस्तेमाल और जरूरी स्टॉक का पूरा हिसाब लगा लिया गया हो।

नोट: यह रिपोर्ट Reuters, ISMA और अन्य कृषि-आर्थिक विश्लेषण स्रोतों पर आधारित है।

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