देहरादून / उत्तराखंड | ENewsXpress Desk
स्नेह के साथ स्वदेशी और पर्यावरण का संदेश
रक्षाबंधन पर भाई-बहन का प्यार और स्वदेशी कौशल, महिला आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी मिलेगा। उत्तराखंड के कई हिस्सों में स्वयं सहायता समूह और महिला समूहों से जुड़ी महिलाएं बीज, ऊन, मोती, ऐपण और अन्य स्थानीय सामग्री से सुंदर और पर्यावरण के अनुकूल राखी बना रही हैं। इस वर्ष बीज राखी के प्रयासों में खास उत्साह देखा जा रहा है।

फतेहपुर में महिलाओं ने शुरू किया अनोखा राखी कारोबार
विकासनगर के फतेहपुर गांव में जय माता दी ग्राम संगठन से जुड़ी 10 से अधिक महिलाएं राखी बना रही हैं। वे ऐपण, रंगीन चावल, वेलवेट कपड़े, गोटे, रुद्राक्ष, मोती और ऊन जैसी सामग्रियों से सुंदर राखी बना रही हैं।
इन राखियों की कीमत 25 से 30 रुपये के बीच है। खास बात यह है कि इस सप्ताह ही इन महिलाओं की राखी की बिक्री लगभग 15 हजार रुपये हो गई है। यह उनके लिए सिर्फ त्योहार का काम नहीं, बल्कि अपने हुनर को बाजार में बेचने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का सशक्त जरिया है।
बीज वाली राखी बनेगी पौधा
उत्तराखंड में बनाई गई कुछ राखियों में छिपे हुए बीज खास आकर्षण का कारण हैं। राखी के बाद इन बीजों को मिट्टी में बोया जा सकता है, जिससे नए पौधे उग सकते हैं।
इसका मतलब है कि कलाई पर बंधी राखी का संदेश त्योहार के बाद भी जमीन पर दिखेगा। भाई-बहन के रिश्ते के साथ प्रकृति की रक्षा का संदेश देने वाली यह पहल रक्षाबंधन को नया अर्थ देती है।
हरिद्वार में भी महिलाओं ने दिखाई रचनात्मकता
हरिद्वार बाईपास में येलो हिल्स स्टोर पर महिला उत्थान एवं बाल कल्याण संस्था से जुड़ी 7-8 महिलाएं फूलों और सब्जियों के बीजों से खास राखी बना रही हैं।
मक्का, राजमा, बींस, भिंडी, सूरजमुखी और भट्ट के बीजों को धागों से सजाकर राखी को आकर्षक बनाया गया है। इसके अलावा राखी का डिब्बा भी गत्ते से बना है, जिसे बाद में गमले के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इन राखियों के साथ टीका, चावल, मोमबत्ती और दो चॉकलेट भी रखी जाती हैं। संस्था की वेबसाइट के जरिए भी इन राखी को खरीदा जा सकता है।
राखी के साथ मिलेगा आत्मनिर्भरता का संदेश
देहरादून के सुमित थपलियाल के अनुसार, इस बार राखी के जरिए स्वदेशी कौशल और आत्मनिर्भरता का संदेश दिया गया है। बीज, मोती, ऊन, फूल और ऐपण जैसी स्थानीय सामग्रियों से बनी ये राखी न सिर्फ सुंदर है, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी खास है।
स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार उत्पादों को बाजार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ने की यह पहल देश के कई हिस्सों में महिलाओं को अपने छोटे उद्यम विकसित करने का सुनहरा मौका देती है।
राखी बंधेगी तो पौधा भी उगेगा
इस रक्षाबंधन पर अगर आप ऐसी राखी चुनते हैं, तो उसका महत्व सिर्फ भाई की कलाई तक नहीं रहेगा। त्योहार के बाद वही राखी मिट्टी में जाकर नया पौधा उगा सकती है।
निष्कर्ष:
इस तरह उत्तराखंड की महिलाओं की मेहनत से बनी ये राखी भाई-बहन के प्यार के साथ-साथ स्थानीय कौशल, महिला सशक्तीकरण, स्वदेशी उत्पाद और पर्यावरण संरक्षण की कहानी बताती हैं।
यह रक्षाबंधन सिर्फ रिश्ते निभाने का नहीं, बल्कि प्रकृति और आत्मनिर्भरता से जुड़ने का संदेश भी दे रहा है।
नोट: यह लेख उपलब्ध जानकारी पर आधारित है।